Saturday, 31 August 2013

Kale badal

धूल बह गई थी बरान्दों से,
आचार भी भींग गयी है छत पर,
बादल वही खड़े थे ऊपर,
भींगता रहा मैं  वहीँ पर और बारिश फिर भी होती रही।

कुत्ते बिल्ली थितुर गाए हैं, घोसले तो गिले वाही पड़े है,
भींग चुके हैं बच्चे भी और छोटे पंची पेड़ और फूल,
और उनपर झूमते भवरे भी
हम खेलते फिर भी रोज़ वहीँ पर 
और बारिश फिर भी होती रहि।

गड्ढे भर चुके थे ज्यादा, बढ़ाते अपना दायरा सड़कों पर।
पंखे सो गए थे सबके घर पर सबके 
बिना बिजली के, पर गर्मी कभी कम ना होती,
हम वही खेलते रहे पसीने में, पर बारिश  होती रहि।

थक गए थे पेड़ और पत्ते,
झटक झटकर पानी उनपर से।
पर लोग और गाड़ियाँ कभी न रुकते,
रेल न रुकति, न रुकता डाक और फिर भी न
रुकति हमारी हिम्मत, काले बादल के मौसम में।
हम वहीँ लड़ते खेलते रहे
और भी कई घंटों तक
और बारिश तब भी होती रही।

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