Tuesday, 12 February 2013

Purana shaher

दिन के सामान महिना निकला,
धीरे धीरे सूरज चढ़ता,
सड़कों पर फिर भीड़ बढ़ती,
सूनी गलिया फिर रॊशन होती।

लोग फिर अपने कम में लगते,
हर पहर दिन का रंग बदलता।
घड़ियाँ दोड़ती मिलकर हमसे,
ताकि हमारी स्पर्धा हो उनसे।
लेकिन जीतता समय है हर पल,
चलता रहता पल पल, हर पल।

जानवर फिर भी सोते रहते,
पर वे उठते, भूख लगे जब,
पर इन्सान अभी भी मन से कहता,
आगे हमे बढ़ते है रहना।

शाम है होती और सूरज ढलता,
पर ढलती नहीं उसकी रौशनी,
जैसे जैसे सूरज ढलता, वैसे हमारा उमंग फिर बढ़ता।
पुरानी गलियां फिर खिल जाती,
दिए, झालर, सब जल उठते।
रंग सब अब एक सा दीखता,
हर रंग पीला और नारंगी में घुलता।
और भी लोग आते, मिलते
पर तोड़ते सब रोज़ा संग।
फिर याद उसे करते हाथ जोड़,
जिसने दिया हाथों का ज़ोर।
फिर सबकी दुआओं को शुक्र कर,
मिले गले और हाथों के शोर।

सज गयी वे गलियां सारी,
रंगों से और रस में लीन,
मेला ऐसा कई दिन के बाद,
होती दिन रात में आज।

नदियाँ दूध की बहती रहती,
ठंडी शरबत और रबड़ी में ढलती।
समोसों की तो होली है, कचोदियों संग वह ठहरी है।
पकवान भी टलते, पुड़ियाँ छनती,
कबाबों का भी रंग निखरता,
सुगंध अब इनकी हवा में चढ़ती।
सारा शहर येही पर जमता,
आते सब विद्वान्, अमीर और चालक, बच्चे, होशियार, गरीब।
उसकी रहमत सब पर होती,
मन जिसका होता अज़ीज़।


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