Sunday, 10 February 2013

Humara ghar

सुबह की इस गर्मी में,
हम चल दिए अपनी खोज में,
काम की हर तलाश में।
फिर और भी घर बनाने को, फिर अपना वंश बढ़ाने को।
सब जुटे हुए हैं होड़ में, कि कैसे पाए कुछ और दम
और जुड़ जाये इस बजी में,
मिलकर सबसे अपने कदम।

वह फर्श इतना सुन्दर था
और पहाड़ सब वे निर्मित थे।
पानी के सामान ज़मीन पर हम चलते रहे धीरे धीरे।
दूर अजीब से पहाड़ थे, इंसानों के कम के,
वे सोते जिनपे और पहेंते जिनको,
पर्वत सामान लगते हमको।

चलकर पहुंचे मंजिल पर हम,
ठंढ जहाँ कहर बरसता,
पर खाली मगर वह खुलता जब भी।
चलते खोजते बढ़ते गए हम,
इन्सान की इस जन्नत में हम।
कहीं छाने रस में पड़े हुए हैं, कहीं दाल हैं खट्टी वाली,
कहीं मटर की पुलाव राखी हुई है, और कहीं पर मिश्री डब्बे में बंद।
पनीर हमे बुलाता उस और चने भी भुने हुए है काबुली।
खीर भी कटोरे में पड़ी है रात की, होती हमारी  रास वहीँ।
खाकर, उठाकर लेते हम,
फिर चल दिए अपने कदम।
कुछ दूर इन्सान के ही घर,
हम येही रहते हर पहर।

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